कृष्ण भजन लिरिक्स

अधर धर मोहे बनवारी बजू मैं बन बसुरिया री

अधर धर मोहे बनवारी,
बजू मैं बन बसुरिया री।।



अधर धर हूँ अधर लटकी,

ना मैं इत की ना में उतकी,
जरा करदों नजरिया री,
बजू मैं बन बसुरिया री।।



बेसुरी हूँ सुरी कर दों,

अधूरी को पुरी कर दों,
पडी तेरे दवरिया री,
बजू मैं बन बसुरिया री।।



छिदाकर अपने सीने को,

ढूढती हूँ कन्हैया को,
बेजुबा हूँ जुबा दे दो,
सुना दो तान दुनिया को,
बजू मैं बन बसुरिया री।।



जगत के घाव को लेकर,

सहन में करती रहती हूँ,
तुम्हारी फूंक की ठंडक को,
याद सदा में करती रहती हूँ,
पास रखलो साँवरिया री,
बजू मैं बन बसुरिया री।।



छुपाकर दर्द सीनें में,

मधुर में तान देती हूँ,
जिन्होने छेद कर रखदी,
उन्है धन्यवाद देती हूँ,
कि भेज दी हाँथ साँवरिया री,
बजू मैं बन बसुरिया री।।



अधर धर मोहे बनवारी,

बजू मैं बन बसुरिया री।।

रचनाकार – श्री सुभाष चन्द्र जी त्रिवेदी।
प्रेषक – सागर त्रिवेदी
9340791553


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